मन ही सर्वेसर्वा है। धम्म पद गाथा ।।2।।

 


मनोपुब्बंगमा धम्मा,मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पसञेन , भासति वा करोती वा।

ततो नं सुख मन्वेति ,छाया व अनपायिनि।।2।।

अर्थ: मन सभी धर्मो का प्रधान है। पुण्य और पाप सभी धर्म मन से ही उत्पन्न होते। यदि कोई प्रसन्न मन से कुछ कहता है या कुछ करता है तो उसका फल सुख होता है। सुख उसका पीछा उसी प्रकार नहीं छोड़ता जिस प्रकार मनुष्य की छाया उसका कभी साथ नहीं छोड़ती।


     मट्ठकुण्डली कि कथा के माध्यम समझिए।

:- मट्ठकुण्डली ब्राह्मण अदिनपुसब्बक का पुत्र था। पिता बहुत ही कृपण था और कभी भी दान-पुण्य नही करता था। यहां तक कि जब उसे अपने पुत्र के लिए आभूषण बनाने की आवश्यकता पड़ी तो उसने उन आभूषणों को भी स्वय ही बनाया ताकि स्वर्णकार को आभूषण बनाने की मजदुरी न देनी पड़ी। जब उसका पुत्र बीमार पड़ा तब पैसे बचाने के लिए उसने चिकित्सक को भी इलाज के लिए नहीं बुलाया। लड़के की तबीयत बिगड़ती गई। अंत में पिता को लगा कि अब उसका ठीक होना संभव नहीं है। फिर भी चिकित्सक को बुलाने के बजाय अदिनपुब्बक ने अपने पुत्र को घर के बाहर खाट पर लिटा दिया ताकि लोग घर के अंदर ना आ सके और उसके धन दौलत को ना देख सके।


उस दिन प्रातः बुद्ध ने अपने अंतर्दृष्टि से सर्वेक्षण किया और अपने सर्वेक्षण में मठ कुंडली को पाया उन्होंने देखा की मठ कुंडली के आध्यात्मिक कल्याण का समय आ गया था अतः उनके चरण मठ कुंडली के आवास की ओर चल पड़े।घर-घर भिक्षाटन करते हुए शास्ता अदिनपुब्बक के घर के सामने पहुंच गए।


मट्ठकुण्डली बरामदे में लेटा हुआ था। तथागत की दिव्य आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। भीतर से उसका ह्रदय शास्ता के दर्शन के लिए बेचैन हो रहा था उसका शरीर जवाब दे रहा था। उसकी काया खाट पर थी पर वह बुद्धि के साथ जुड़ चुका था।

अंतिम समय आ गया। मट्ठकुंडली ने आंखे मूंद ली। मरते समय उसका हृदय बुद्ध के प्रति श्रद्धा से भरा हुआ था इतना काफी था उसका जन्म तावतिस दिव्य लोक में हुआ।


तावतींश दिव्य लोक से मठकुंडली ने देखा कि उसका पिता उसकी मृत्यु पर विह्वल होकर रो रहा है अतः वह अपने पुराने रूप में पिता के सामने प्रकट हुआ। उसने अपने पिता को अपने पुनर्जन्म के बारे में बताया तथा आग्रह किया कि वह बुद्ध को भोजन के लिए आमंत्रित करें। बुद्ध भोजन के लिए आमंत्रित हुए। भोजन के बाद अदिनपुब्बक कि परिवार वालों ने बुद्ध से प्रश्न किया,"क्या कोई व्यक्ति बिना दान दिए, उपवास किए, कर्मकांड किए, मात्र बुध में पूर्ण समर्पण से तावतिंश दिव्य लोक में जन्म ले सकता है?? प्रत्युत्तर में मट्ठा कुंडली को उपाशको के सम्मुख प्रकट होने के लिए कहा। आदेश पाकर मठ कुंडली दिव्या आभूषणों के साथ आम जनता के सामने प्रकट हुआ तथा स्पष्ट किया कि उसका जन्म तावतींश दिव्यलोक में हुआ है। उसे देखकर सबों का विश्वास करना पड़ा बुद्ध के प्रति पूर्ण समर्पण मात्र सेम अट कुंडली को इतना अधिक लाभ हुआ था।


टिप्पणी:-मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घटित होता है वह विचारों का ही परिणाम है। अगर विचार पवित्र हो तो वाणी और कर्म भी पवित्र होंगे पवित्र विचार वाणी और कर्म से जीवन में सुख प्राप्त होगा।


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