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भगवान बुद्ध और वर्धमान महावीर की प्रतिमा में अंतर।

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नमो बुद्धाय जय भीम हम जानेंगे कि भगवान बुद्ध वर्धमान महावीर की प्रतिमाओं में क्या अंतर होता है?? हम जानेंगे कि भगवान बुद्ध और वर्धमान महावीर स्वामी की प्रतिमाओं में क्या अंतर होता है दोनों भगवानों के प्रतिमाएं ध्यान मुद्रा में बनाई जाती हैं लेकिन इन ध्यान मुद्राओं में बहुत ही सूक्ष्म अंतर हैं  . इन पांच तरीकों से भगवान बुद्ध और वर्धमान महावीर स्वामी की प्रतिमाओं को पहचानिए :- भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी मे यह अंतर स्पष्ट रूप से आपको देखने को मिलेगा भगवान बुद्ध चीवर (वस्त्र) पहने दिखाईं देंगे महावीर स्वामी जी नहीं वे नग्न अवस्था में दिखाईं पड़ते हैं। भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी जी के बाल एक जैसे घूंघरालू दिखलाई पड़ता है लेकिन भगवान बुद्ध के मूर्तियों में उनके कान लंबे होते जो लेकिन महावीर स्वामी जी के कान छोटे होते हैं। भगवान बुद्ध धम्मचक्क  प्रवर्तन ध्यान मुद्रा में उनकी प्रतिमाएं बनाते समय तीन उंगलियों को दर्शाया जाता है जिसका अर्थ है प्रज्ञा सील करुणा भगवान महावीर स्वामी के मूर्तियों में यह आपको देखने को नहीं मिलेगी भगवान बुद्ध को कमल आसन पर बैठें दिखाया जाता है भगवान महाव...

समाज के युवा।।

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  जय भीम नमो बुद्धाय... समय कोई भी रहा हो सामाजिक आध्यात्मिक तक की पगडंडी राह युवा ने ही बनाई है हिमालय की ऊंचाई और सागर की गहराई को नापने का साहस दीवाने ही दिखाया है। अतीत इस बात का सबसे बड़ा गवाह है कि जब भी किसी समाज देश अथवा युग में बदलाव की आवश्यकता और ललक पैदा हुई है तब उस काल की युवा पीढ़ी ने आगे बढ़कर अपना बलिदान दिया है भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रत्येक पृष्ठ ऐसे ही गाथाओं से भरा पड़ा है। दुनिया में जो भी परिवर्तन बदलाव आए हैं उनमें युवाओं की अपनी भूमिका रही है अगर कहां जाएगी युवा ही परिवर्तन बदला निर्माण रचना संघर्ष साधना का मार्ग प्रस्तुत करता है तो यह कदापि अतिशयोक्ति नहीं बल्कि यह सत्य है। सामाजिक राजनीतिक सांस्कृतिक आर्थिक धार्मिक आध्यात्मिक कोई भी परिवर्तन एवं निर्माण उसके पीछे युवा ही महत्वपूर्ण भागीदारी है। युवाओं ने ही आज तक नए मार्ग खोले हैं युवा करवट लेता है तभी नए रास्ते खुलते हैं युवा एक सकती है दुनिया में हुए किसी भी प्रकार के परिवर्तन में युवा ही आगे रहा है वह परिवर्तन का वाहक है युवा के चारों ओर ही परिवर्तन बदलाव रचना निर्माण संघर्ष साधना रहती है। प्रत्...

मन ही सर्वेसर्वा है। धम्म पद गाथा ।।2।।

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  मनोपुब्बंगमा धम्मा,मनोसेट्ठा मनोमया। मनसा चे पसञेन , भासति वा करोती वा। ततो नं सुख मन्वेति ,छाया व अनपायिनि।।2।। अर्थ: मन सभी धर्मो का प्रधान है। पुण्य और पाप सभी धर्म मन से ही उत्पन्न होते। यदि कोई प्रसन्न मन से कुछ कहता है या कुछ करता है तो उसका फल सुख होता है। सुख उसका पीछा उसी प्रकार नहीं छोड़ता जिस प्रकार मनुष्य की छाया उसका कभी साथ नहीं छोड़ती।       मट्ठकुण्डली कि कथा के माध्यम समझिए। :- मट्ठकुण्डली ब्राह्मण अदिनपुसब्बक का पुत्र था। पिता बहुत ही कृपण था और कभी भी दान-पुण्य नही करता था। यहां तक कि जब उसे अपने पुत्र के लिए आभूषण बनाने की आवश्यकता पड़ी तो उसने उन आभूषणों को भी स्वय ही बनाया ताकि स्वर्णकार को आभूषण बनाने की मजदुरी न देनी पड़ी। जब उसका पुत्र बीमार पड़ा तब पैसे बचाने के लिए उसने चिकित्सक को भी इलाज के लिए नहीं बुलाया। लड़के की तबीयत बिगड़ती गई। अंत में पिता को लगा कि अब उसका ठीक होना संभव नहीं है। फिर भी चिकित्सक को बुलाने के बजाय अदिनपुब्बक ने अपने पुत्र को घर के बाहर खाट पर लिटा दिया ताकि लोग घर के अंदर ना आ सके और उसके धन दौलत को ना देख सक...

मन से बड़ा कुछ नहीं धम्म पद गाथा संख्या ।।1।।

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  आप सभी सम्मानित धम्म बंधुओ को नमो बुद्धाय जय भीम..                       धम्म पद गाथा और कथा    मनोपुब्बंगमा धम्मा,मनोसेट्ठा मनोमया। मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोती वा। ततो नं दुक्खमन्वेति,चक्कं व वहतो पदं।।1।। अर्थ: मन सभी प्रवृत्तियों का प्रधान है सभी धर्म (अच्छा या बुरा) मन से ही उत्पन्न होते हैं यदि कोई दूषित मन से कोई कर्म करता है तो उसका परिणाम दुख होता है दुख उसका अनुसरण उसी प्रकार करता है जिस प्रकार बैलगाड़ी का पहिया बैल के खुर के निशान का पीछा करता है। समझिए कहानी के माध्यम से चछुपाल कि कथा यह गाथा बुद्ध ने श्रावस्ती वन विहार में चछुपाल नामक एक नेत्रहीन भिक्षु के संदर्भ में कही थी।  एक दिन भिक्खू चक्षु पाल जेतवन विहार में बुद्ध को श्रृद्धा सुमन अर्पित करने आया। रात्रि में वह ध्यान साधना में लीन टहलता रहा उसके पैरों के निचे कई कीड़े मकोड़े दबकर मर गए। सुबह में कुछ अन्य भिक्षुगण वहां आए और उन्होंने कीड़े मकोड़े को मरा पाया उन्होनें चछुपाल रात्रि बेला में पाप कर्म किया था।  उन्होंने बुद्ध को सूचित क...

होली त्यौहार की सच्चाई।

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  आप सभी सम्मानित साथियों को नमो बुद्धाय क्रांतिकारी जय भीम हमारे इस ब्लॉग में आपका स्वागत है आप सभी बहुजन समाज के लोगों को आप का असली इतिहास होली त्यौहार के बारे में बताने जा रहे हैं ज्यादा से ज्यादा इस ब्लॉग को शेयर करें ताकि लोगों तक बहुजन का इतिहास पता चल सके। हिंदू मान्यताओं के अनुसार एक राजा था हिरण कश्यप उसकी बहन होलिका फीवर पुत्र प्रह्लाद था राजा हिरण कश्यप राम का विरोधी था , उसके राज्य में राम को कोई नहीं मानता था प्रहलाद राम भक्त हो गया सभी जानते हैं है कि राजा ने उसे मारने की योजना बनाई कहते हैं कि होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी इसलिए होलिका को कहा गया कि वह बालक प्रहलाद को गोद में लेकर आज में बैठ जाए ताकि प्रहलाद जलकर मर जाए लेकिन यह उल्टा हुआ होलिका जल गई और पहलाद बच गया इसी क्रम में होली का त्यौहार आरंभ हो गया वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कहानी पूर्णता असत्य जान पड़ती है सभी जानते हैं कि यदि आग में एक जैसी दो वस्तुएं डाली जाए तो दोनों साथ साथ नष्ट हो जाएंगे अथवा दोनों ही जल जाएंगे किंतु वहां जिसने जलने का वरदान था वह जल जाता है और जिसे जल जाना था वह बस जाता ह...

जब भगवान बुद्ध ने बताया धर्म और धम्म में अंतर?

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  आप सभी सम्मानित साथियों को नमो बुद्धाय जय भीम आज की इस ब्लॉग में हम सब जानेंगे धर्म और धम्म में अंतर... भगवान बुद्ध कहते हैं धर्म में आप ईश्वर के खिलाफ नहीं बोल सकते, धर्म ग्रंथों की अवहेलना नहीं कर सकते, अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं कर सकते। जबकि धम्म तो स्वयं को जांचने परखने और अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की शिक्षा है। धर्म कहता है कि तेरा भला करने तथाकथित ईश्वर जैसी कोई ताकत आएगी जबकि धम्म कहता है अप्प दीपो भव: अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो। बुद्ध भी कहते हैं ना मैं मुक्तिदाता हूं ना मैं मोछदाता हूं,मैं सिर्फ मार्ग दिखाने वाला हूं धम्म अर्थात जीवन जीने का सर्वोत्तम मानवतावादी आधार बहुत से लोग मानते होंगे कि धम्म और धर्म एक ही है उनको विश्लेषण करने की जरूरत है। धर्म में जन्म लेना पड़ता है जबकि धम्म में शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है धर्म से असमानता है भेदभाव है ऊंच-नीच है जबकि धम्म में सब एक हैं सब बराबर है कोई भेदभाव नहीं है धम्म एक शिक्षा है एक विज्ञान है जो सबके लिए है धर्म में विभाजन है अधिकार वर्गों में विभाजित है जबकि धम्म में वर्ग हीनता है अधिकार ह...

भारत का सबसे शक्तिशाली बौद्ध सम्राट।

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प्रियदर्शी अशोक सम्राट नमस्कार दोस्तों हमारे इस ब्लॉग में आप सभी का स्वागत है आज हम जानेंगे सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें, आप लोगों ने तो सुना होगा प्राचीन समय में भारत सोने की चिड़िया थी। लेकिन आप लोग क्या जानते हैं भारत का शक्तिशाली और वीर पराक्रमी शासक कौन था तो आइए जानते हैं मौर्य वंश के दो महान शासक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और प्रियदर्शी सम्राट अशोक अभी तक के समय का सबसे शक्तिशाली शासक साबित हुए हैं मौर्य वंश की स्थापना सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी और वही भारत के सबसे पहले राजा थे और भारत को जो अलग-अलग खंडों में बांटा था उन्हें एक एक कर जीते चले गए और अखंड भारत का निर्माण किया और खुद को अखंड भारत का सम्राट साबित किया उनका साम्राज्य 5000000 वर्ग किलोमीटर में फैला था और खास बात यह है कि इन दोनों सम्राटों को युद्ध भूमि में पराजित करने की क्षमता भारत के किसी राजा में नहीं थी, जानिए मोर वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में कुछ बातें चंद्रगुप्त मौर्य सम्राट अशोक के दादा थे शासन केवल साम्राज्य विस्तार से नहीं होता अगर ऐसा होता तो सिकंदर सबसे श...