तथागत बुद्ध नें जब बताया मन क्यों अशांत रहता है!मन को शांत कैसे करें?

दोस्तों हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है आज की इस सुंदर से ब्लॉग मे हम आपको भगवान बुद्ध से जुड़ी कहानी को बताएंगे और कुछ सिख जीवन के लिए प्राप्त करेंगे कहानी अच्छी लगेगी तो शेयर जरूर करें🙏🙏
















..एक समय की बात है एक दिन तथागत गौतम बुद्ध अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे।तभी एक शिष्य उठकर बोला बुद्ध क्या हर दुःख का निवारण किया जा सकता है बुद्ध बोले यह सत्य है की हर दुःख का निवारण किया जा सकता है इसी संदर्भ में मैं तुम्हे एक कथा सुनाता हूं। एक सेठ का नौकर लंबे समय से उसके पास रहकर उसकी सेवा करता था ,वह बड़ा ईमानदार था साफ सफाई का पूरा ध्यान रखता था इसलिए सेठ जी उससे बहुत पसंद रहा करते थें। एक दिन जब शाम को सेठ जी घर आएं तो देखा की उनकी पुरानी दीवार घड़ी टूटी हुई है, उन्होंने नौकर को बुलाकर पूछा यह घड़ी कैसे टूट गईं नौकर बोला मालिक मैं सफाई कर रहा था तभी घड़ी हाथ से छुट गई गलती मेरी है आप मुझे क्षमा करें,सेठ तेज आवाज़ में बोला क्षमा मांगने से क्या होता है? घड़ी वर्षों से कमरे में लगी थी कमरें की सोभा थी और तुम्हें पता ही है यह मुझे कितनी प्रिय थी । डांटने के अलावा सेठ जी और कर भी क्या सकते थें , बहुत भरोसे का नौकर जो था उस रात सेठ जी को बिलकुल भी नींद नही आ रही थी वह बार बार बस करवटें बदलते रहता था , घड़ी टूटने की बात मन में बार बार आ रही थी जब उन्हें नींद नही आई तो वह बिस्तर से उठकर घर में इधर उधर डोलने लगा तभी अचानक उनकी नजर उनके नौकर पर पड़ी वह खराटै ले रहा था उससे सेठ जी को और भी दुख हुआ उन्होंने मन ही मन सोचा मालिक के नुकसान का इसे जरा भी इसे ख्याल नही है। इसे जरा दुःख नहीं यह आराम से खराटै लेकर सो रहा है। नौकर को इतना शांति सोता हुआ देखकर सेठ जी को बहुत गुस्सा आया उन्होंने अगले दिन एक प्रयोग करने का निश्चय किया। अगले दिन नौकर ने जब अपना सारा काम खत्म कर लिया तो शाम को सेठ जी ने उसे बड़े प्यार से उसे बुलाया और कहा देखो कल नुकसान हो गया था इसलिए मैं बहुत गुस्से में था इसी से मै तुम्हें डांट दिया था पर यह तो कल की बात थी पर आज मैं बहुत प्रसन्न हूं , मेरे साथ तुम इतना दिन तक हो,कल ही मेरे मन में आया था की मुझे तुम्हारी सेवा के लिए कुछ इनाम दे देना चाइए सोचता हूं की क्यों ना यह घड़ी ही तुम्हे दें दीं जाय पर क्या करें वह तो तुम्हारे हाथ से टूट गईं यदि नही टूटी होती तो वह आज तुम्हारी होती यह कहकर सेठ तो उस रात बड़े चैन से सोया पर नौकर सारी रात करवटें बदलता रहा बार बार उसके मन में एक वही बात आ रहीं थीं,की यदि घड़ी नहीं टूटी होती तो वह मेरी होती कथा सुनाकर बुद्ध बोले अब तुम समझ चूके होगे की लोभ ही दुःख का सबसे बड़ा कारण होता है । इसे त्यागकर ही दुःख से मुक्ति पाई जा सकती है । जब उस घड़ी का संबंध उस सेठ से जुड़ा हुआ था तब उसके टूटने का दुःख उस सेठ को हुआ , क्योंकि घड़ी को लेकर उसके मन लालच लोभ था, लेकिन जैसे ही उस घड़ी का संबंध उस सेठ से हठकर उस नौकर से हो गया उस नौकर के मन में लगाव पैदा हो गया अब घड़ी का दुःख नौकर को लगने लगा।

                          🌺🌺नमो बुद्धाय जय भीम💐🙏

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भारत का सबसे शक्तिशाली बौद्ध सम्राट।

मन से बड़ा कुछ नहीं धम्म पद गाथा संख्या ।।1।।

मन ही सर्वेसर्वा है। धम्म पद गाथा ।।2।।