होली त्यौहार की सच्चाई।

 










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हिंदू मान्यताओं के अनुसार एक राजा था हिरण कश्यप उसकी बहन होलिका फीवर पुत्र प्रह्लाद था राजा हिरण कश्यप राम का विरोधी था, उसके राज्य में राम को कोई नहीं मानता था प्रहलाद राम भक्त हो गया सभी जानते हैं है कि राजा ने उसे मारने की योजना बनाई कहते हैं कि होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी इसलिए होलिका को कहा गया कि वह बालक प्रहलाद को गोद में लेकर आज में बैठ जाए ताकि प्रहलाद जलकर मर जाए लेकिन यह उल्टा हुआ होलिका जल गई और पहलाद बच गया इसी क्रम में होली का त्यौहार आरंभ हो गया वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कहानी पूर्णता असत्य जान पड़ती है सभी जानते हैं कि यदि आग में एक जैसी दो वस्तुएं डाली जाए तो दोनों साथ साथ नष्ट हो जाएंगे अथवा दोनों ही जल जाएंगे किंतु वहां जिसने जलने का वरदान था वह जल जाता है और जिसे जल जाना था वह बस जाता है मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो एक राजा इतनी छोटी सी बात पर इतनी आयु के अपने पुत्र को इतना भयानक दंड कभी नहीं देगा वास्तविक कहानी जोकि तथ्यपरक है और बहुजन साहित्य में पाई जाती है यह वह है कि प्राचीन काल में लखनऊ के समीप हिरण कश्यप नामक राजा राज करता था अनार्य होने के कारण वह आर्य नायक जैसे कि विष्णु राम हरि का घोर विरोधी था इसलिए उसके राज्य को हरीद्रोही कहा जाता था जो आज हरदोई जिला कहलाता है हिरण कश्यप का पुत्र गया व्यसनों में पढ़कर आवारा हो गया था सुधार के तमाम प्रयास विफल हो गए अंत में राजा ने उसे घर से बाहर निकाल दिया राजा के विरोधियों ने मौका पाकर उसे अपने साथ मिला लिया अब वह आवारा मंडली के साथ रहने लगा जैसा कि आमतौर पर होता है प्रहलाद की दुआ होलिका का स्नेह उसके प्रति फिर भी बना रहा वह रोज शाम को राजा की नजर से बचा कर आंचल में छुपा कर उसे खाना खिलाने जाने लगी एक दिन जब वह खाना लेकर गई तो प्रह्लाद व उसके दोस्त नशे में थे उसके दोस्तों ने होलिका के साथ व्यभिचार किया भेद खुल जाने के भय से होलिका को मार डाला सबूत मिटाने के लिए शव को जला डाला  इसके लिए रात में जहां जिस रूप में लकड़ी मिली जैसे कि किसी की खाट किसी का दरवाजा किसी की छप्पर आदि उसे लाश पर डालते चले गए और आग लगा दी होली की लकड़ी एकत्र करने कल लगभग यही प्रक्रिया आज भी जारी है तथा नशे का भी प्रचलन है जब राजा को इस बात का पता चला तो उसने प्रहलाद समेत पूरी आवारा मंडली को गिरफ्तार करवा लिया हिरण कश्यप न्याय प्रिय राजा था अपराध में अपने पुत्र के शामिल होने के कारण उसने स्वयं न्याय ना कर मामला न्याय पंचायत को सौंप दिया न्याय पंचायत ने फैसला दिया कि अबला नारी को मारना कायरता है अतः दोषी लोग वीर नहीं अभी रहें कायर हैं इसलिए इनको कायरता का टीका अबीर लगाकर मुंह काला करके गधे पर बैठाकर गले में जूते चप्पल की माला डाली जाए आज भी अक्सर ऐसा जुलूस निकाला जाता है जिसे लोग होली की बरात कहते हैं समय बीतता गया लोग घटना भूल गए धोबियों ने इसे उल्टा रूप देखकर कलंक का टीका सभी के माथे पर लगा दिया हमारे पूर्वजों ने कारों के माथे पर कलंक का टीका लगाया आज हम उसे सम्मान समझ कर खुद लगा रहे हैं फैसला आपके हाथ में है कि आप कायर बने या बहादुर।।

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